शरणागत नितीश कुमार का आखिरी पस्ती भरा दांव

बिहार की राजनीति में बहुविध हलचल है। मुख्यमंत्री नितीश कुमार राज्यसभा सांसद बनने जा रहे हैं। 16 मार्च को चुनाव होने हैं। उनके बेटे निशांत ने राजनीति में एंट्री की है। अगले मुख्यमंत्री को लेकर कयासबाजी चल रही है। बिहार ऐतिहासिक रूप से भारतीय राजनीति की वह प्रयोगशाला रहा है, जिसके नतीजों ने दूरगामी असर डाले हैं फिर चाहे वह जेपी की संपूर्ण क्रांति हो या मंडल आयोग के बाद उपजी सामाजिक न्याय की लहर। लेकिन वर्तमान में बिहार के मुख्यमंत्री को ‘जबरिया रिटायर’ कर राज्यसभा में भेजने का जो ‘नया प्रयोग’ हो रहा है, वह किसी के गले नहीं उतर रहा।

नितीश कुमार का यह तर्क भी हजम नहीं हो पा रहा है कि वे सारे सदनों में रह चुके हैं और अब बस राज्यसभा की कमी को पूरा करना चाहते हैं।

नितीश कुमार का राज्य के शीर्ष सियासी पद से हटने पर राजी हो जाना सीधे तौर पर उनकी अपनी ही पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) के भविष्य को दांव पर लगा देता है। यदि इतिहास पर नजर डालें तो जनता पार्टी की कोख से ही जनता दल और फिर जनता दल से कई दलों का निर्माण हुआ, जिनमें जनता दल (यू) भी शामिल है।

इनमें से कुछ दलों का तो आज भी अपने-अपने राज्यों में अच्छा प्रभाव हैं, जैसे उप्र में समाजवादी पार्टी, बिहार में राजद और कर्नाटक में जनता दल (एस)। लेकिन जनता पार्टी या जनता दल से ही निकलीं कई अन्य पार्टियां इतिहास के पन्नों में खो गईं, जैसे चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी। सुब्रमण्यम स्वामी भी अपनी एक पार्टी (जनता पार्टी) चलाते थे, लेकिन उनके भाजपा में शामिल होते ही वह भी विलुप्त हो गई।

तो क्या नितीश कुमार के इस कदम, जिसे उनके कई विरोधी भाजपा के समक्ष उनका ‘सरेंडर’ बता रहे हैं, से जनता दल (यू) का अस्तित्व संकट में नहीं आ जाएगा?

नितीश कुमार की राजनीति को समझने के लिए केवल उनके हालिया कदमों को देखना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए भारतीय लोकतंत्र में पिछले तीन दशकों में हुए नैतिक और वैचारिक परिवर्तनों को भी समझना होगा। नितीश कुमार का राजनीतिक जीवन एक समय वैचारिक प्रतिबद्धता, समाजवादी पृष्ठभूमि और प्रशासनिक सुधारों की उम्मीदों से शुरू हुआ था, लेकिन समय के साथ यह यात्रा उस दौर की राजनीति का प्रतीक बन गई है जिसमें सत्ता की निरंतरता अक्सर सिद्धांतों से बड़ी हो जाती है।

आज जब उनके राजनीतिक जीवन को “आखिरी दांव” के रूप में देखा जा रहा है, तो यह केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का प्रश्न नहीं है; यह उस व्यापक संकट का भी संकेत है जिसमें भारतीय राजनीति धीरे-धीरे मूल्यहीनता, अवसरवाद और नैतिक अस्पष्टता की ओर बढ़ती दिखती है।

नितीश कुमार का उदय उस दौर में हुआ जब भारतीय राजनीति में समाजवादी विचारधारा की गहरी उपस्थिति थी। वे उस राजनीतिक परंपरा से निकले जिसमें जयप्रकाश नारायण  और राम मनोहर लोहिया जैसे नेताओं का प्रभाव था। उस परंपरा का मूल लक्ष्य सत्ता प्राप्त करना भर नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक नैतिकता और जनसरोकारों को राजनीति का आधार बनाना था।

इसी पृष्ठभूमि में नितीश कुमार ने अपने शुरुआती वर्षों में तुलनात्मक रूप से एक ईमानदार, सादगीपूर्ण और प्रशासनिक सुधारों के समर्थक नेता की छवि बनाई। जब वे बिहार के मुख्यमंत्री बने, तो शुरुआती वर्षों में सड़कों, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक सुधारों के कारण उन्हें “सुशासन” का प्रतीक माना गया। उस समय यह उम्मीद पैदा हुई थी कि वे बिहार की राजनीति को अपराध और जातीय वर्चस्व की राजनीति से कुछ हद तक बाहर निकाल पाएंगे।

लेकिन राजनीति की लंबी यात्रा में अक्सर व्यक्तित्व और सिद्धांत दोनों की परीक्षा होती है। समय के साथ नितीश कुमार की राजनीति में सबसे अधिक दिखाई देने वाली प्रवृत्ति रही है गठबंधन बदलने की रणनीति। वे कभी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा रहे, बाद में नरेन्द्र मोदी के उभार के बाद उससे अलग हो गए, फिर वापस उसी गठबंधन में लौटे, और बाद में फिर उससे अलग होकर लालू प्रसाद यादव तथा तेजस्वी यादव के साथ सत्ता में आ गए।

यह बार-बार का राजनीतिक परिवर्तन केवल रणनीतिक लचीलापन नहीं स्वीकारा गया बल्कि धीरे-धीरे इसे सिद्धांतहीन अवसरवाद के रूप में देखा जाने लगा।

यहीं से नितीश कुमार की राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है—विश्वसनीयता का संकट। लोकतंत्र में जनता केवल विकास के वादों पर नहीं बल्कि राजनीतिक ईमानदारी पर भी भरोसा करती है। जब कोई नेता बार-बार अपने राजनीतिक साझेदारी बदलता है तो उसके समर्थकों के बीच भी यह प्रश्न उठने लगता है कि उसकी राजनीति का वास्तविक आधार क्या है। क्या वह किसी स्पष्ट विचारधारा से संचालित है, या केवल सत्ता में बने रहने की रणनीति से?

यह सवाल नितीश कुमार की राजनीति के साथ लगातार जुड़ा रहा है और आज उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन चुका है।

यह समस्या केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है; यह भारतीय राजनीति के उस व्यापक संकट को भी दिखाती है जिसमें विचारधारा की जगह प्रबंधकीय राजनीति ने ले ली है। पहले राजनीतिक दल किसी न किसी वैचारिक आधार पर खड़े होते थे—समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद, जनपक्षधरता या उदारवाद लेकिन धीरे-धीरे इन विचारों की जगह सत्ता प्रबंधन, चुनावी गणित और जातीय समीकरणों ने ले ली है। नितीश कुमार की राजनीति इसी प्रवृत्ति का एक सशक्त उदाहरण बन गई है।

उनकी दूसरी बड़ी कमजोरी है राजनीतिक उत्तराधिकार और संगठन की सीमाएँ। लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद वे अपने दल को एक मजबूत वैचारिक और संगठनात्मक ढांचे में नहीं बदल पाए। उनकी पार्टी अक्सर उनके व्यक्तिगत नेतृत्व पर ही निर्भर रही। इसके विपरीत भाजपा जैसे दल ने संगठनात्मक विस्तार के माध्यम से अपनी राजनीतिक शक्ति बढ़ाई, जबकि राष्ट्रीय जनता दल ने अपने सामाजिक आधार को बनाए रखा।

इस स्थिति में नितीश कुमार का राजनीतिक प्रभाव काफी हद तक उनके व्यक्तिगत करिश्मे और प्रशासनिक अनुभव पर टिका रहा। लेकिन जैसे-जैसे उम्र और राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलती गईं, यह आधार कमजोर पड़ता गया।

तीसरी कमजोरी है नई पीढ़ी के साथ संवाद का अभाव। बिहार जैसे राज्य में बड़ी आबादी युवा है, जिसकी आकांक्षाएँ केवल जातीय प्रतिनिधित्व या प्रतीकात्मक राजनीति तक सीमित नहीं हैं। वे रोजगार, शिक्षा और आर्थिक अवसरों की तलाश में हैं। पिछले वर्षों में बिहार से बड़े पैमाने पर पलायन की समस्या लगातार चर्चा में रही है। ऐसे में युवाओं के बीच यह सवाल उठता रहा है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद राज्य की आर्थिक संरचना में अपेक्षित बदलाव क्यों नहीं हो पाया।

इस संदर्भ में नितीश कुमार की सरकारों की उपलब्धियों के साथ-साथ उनकी सीमाएँ भी सामने आती हैं।

लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या नितीश कुमार की राजनीति केवल उनकी व्यक्तिगत कमजोरियों का परिणाम है, या यह उस मूल्यहीन राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है जो धीरे-धीरे भारतीय लोकतंत्र में मजबूत होती जा रही है। पिछले कुछ दशकों में राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता का स्थान धीरे-धीरे कम हुआ है और उसकी जगह चुनावी जीत को ही अंतिम लक्ष्य मानने वाली संस्कृति ने ले ली है।

इस संस्कृति में राजनीतिक नैतिकता अक्सर एक बाधा के रूप में देखी जाती है, जबकि अवसरवाद को व्यावहारिकता कहा जाता है।

इस संदर्भ में नितीश कुमार की राजनीति एक दिलचस्प उदाहरण है। वे स्वयं को अक्सर एक व्यावहारिक नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेते हैं। लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह व्यावहारिकता कई बार नैतिक अस्पष्टता में बदल जाती है। जब कोई नेता अपने विरोधियों के साथ बार-बार सत्ता साझा करता है और फिर उनसे अलग हो जाता है, तो जनता के लिए यह समझना कठिन हो जाता है कि उसकी राजनीति का वास्तविक उद्देश्य क्या है।

भारतीय राजनीति में यह प्रवृत्ति केवल बिहार तक सीमित नहीं है। कई राज्यों और राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन और विरोध के समीकरण लगातार बदलते रहते हैं। इससे लोकतंत्र में एक प्रकार की राजनीतिक अस्थिरता और वैचारिक भ्रम पैदा होता है। जनता के लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि कौन सा दल किस विचार का प्रतिनिधित्व करता है।

नितीश कुमार के “आखिरी दांव” को इसी व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। यह दांव केवल सत्ता बनाए रखने का प्रयास नहीं है; यह उनकी राजनीतिक विरासत को बचाने की भी कोशिश है। वे शायद यह समझते हैं कि यदि वे वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में अपनी प्रासंगिकता बनाए नहीं रख पाए, तो आने वाले समय में बिहार की राजनीति पूरी तरह नई पीढ़ी के हाथों में चली जाएगी। इसलिए उनकी हर राजनीतिक चाल अब पहले से अधिक निर्णायक और जोखिम भरी दिखाई देती है।

लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि राजनीति में केवल रणनीति ही पर्याप्त नहीं होती। किसी भी नेता की दीर्घकालिक प्रतिष्ठा इस बात पर निर्भर करती है कि उसने अपने समय में राजनीतिक नैतिकता और जनहित के लिए कितना योगदान दिया। यदि कोई नेता बार-बार सत्ता में आता है लेकिन समाज में स्थायी परिवर्तन नहीं ला पाता, तो उसकी राजनीतिक सफलता भी धीरे-धीरे विवादास्पद हो जाती है।

नितीश कुमार के मामले में भी यही सवाल उठता है। क्या उनकी राजनीति बिहार को स्थायी रूप से बदलने में सफल रही है, या वह केवल प्रशासनिक सुधारों और गठबंधन प्रबंधन तक सीमित रह गई है? यह प्रश्न अभी पूरी तरह तय नहीं हुआ है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि उनकी राजनीतिक यात्रा भारतीय लोकतंत्र के उस संक्रमणकाल को दर्शाती है जिसमें आदर्श और व्यावहारिकता के बीच संतुलन लगातार टूटता जा रहा है।

आज भारतीय राजनीति में जिस प्रकार की भाषा, ध्रुवीकरण और नैतिक गिरावट दिखाई देती है, उसमें नितीश कुमार जैसे नेताओं की भूमिका भी चर्चा का विषय बनती है। एक समय वे संयमित और संतुलित राजनीति के प्रतीक माने जाते थे, लेकिन लगातार बदलते गठबंधनों ने उनकी उस छवि को धूमिल कर दिया। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि राजनीति में केवल व्यक्तिगत ईमानदारी पर्याप्त नहीं होती; राजनीतिक स्थिरता और वैचारिक स्पष्टता भी उतनी ही आवश्यक होती है।

अंततः नितीश कुमार का आखिरी दांव केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है; यह भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़े उस बड़े प्रश्न का प्रतीक है कि क्या राजनीति फिर से मूल्यों और सिद्धांतों की ओर लौट सकती है, या वह पूरी तरह चुनावी गणित और सत्ता की रणनीतियों में सिमट जाएगी।

यदि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम बनकर रह जाती है, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर हो जाती है। लेकिन यदि नेता अपने अनुभव और विवेक के आधार पर नैतिक साहस दिखाएं, तो राजनीति फिर से जनविश्वास अर्जित कर सकती है।

इस दृष्टि से नितीश कुमार का वर्तमान दौर केवल उनके व्यक्तिगत भविष्य का प्रश्न नहीं है। यह उस ऐतिहासिक क्षण का भी संकेत है जिसमें यह तय होगा कि भारतीय राजनीति अवसरवाद की दिशा में और आगे बढ़ेगी या फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की ओर लौटेगी। शायद यही कारण है कि उनके हर कदम को आज केवल एक राजनीतिक रणनीति नहीं बल्कि एक प्रतीकात्मक आखिरी दांव के रूप में देखा जा रहा है—जिसमें जीत या हार से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इतिहास इसे किस रूप में याद करेगा।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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